Introduction
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दुनिया भर में तकनीक और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है।
लेकिन 2025 में AI का तेज़ विस्तार अब पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बनता दिख रहा है।
एक ताज़ा और व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई रिसर्च के अनुसार, AI सिस्टम से होने वाला कार्बन उत्सर्जन अब एक बड़े महानगर के बराबर पहुंच गया है।
Detailed News Report
2025 में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, AI आधारित डेटा सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम से होने वाला कुल कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन लगभग 80 मिलियन टन तक पहुंच गया है।
यह आंकड़ा न्यूयॉर्क सिटी जैसे बड़े शहर के सालाना उत्सर्जन के बराबर बताया गया है।
यह अध्ययन Digiconomist के शोधकर्ता Alex de Vries-Gao द्वारा किया गया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया और पर्यावरण विशेषज्ञों ने व्यापक रूप से कवर किया।
रिपोर्ट में पहली बार विशेष रूप से AI गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को अलग करके मापा गया है।
इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया कि 2025 में AI इंफ्रास्ट्रक्चर ने करीब 765 अरब लीटर पानी की खपत की।
यह खपत कई देशों में साल भर बिकने वाले बोतलबंद पानी से भी अधिक है।
Source:
– Digiconomist Research Report
– The Guardian (Technology & Climate Coverage)
– International Energy Agency (IEA)
यह कैसे और क्यों हुआ
पिछले दो वर्षों में बड़े-बड़े Large Language Models (LLMs), जनरेटिव AI टूल्स और क्लाउड-आधारित AI सेवाओं का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा।
इन सिस्टम्स को चलाने के लिए हजारों GPU, हाई-एंड सर्वर और लगातार कूलिंग की जरूरत होती है।
International Energy Agency (IEA) के अनुसार,
वैश्विक डेटा सेंटर की बिजली खपत 2030 तक दोगुनी हो सकती है।
AI इस बढ़ती ऊर्जा मांग का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
Source:
– International Energy Agency (IEA) Official Statements
Benefits & Disadvantages
Benefits
• AI से हेल्थकेयर, एजुकेशन और बिज़नेस में तेज़ इनोवेशन हुआ
• ऑटोमेशन और प्रोडक्टिविटी में बड़ा सुधार
• AI का उपयोग क्लाइमेट मॉडलिंग और एनर्जी ऑप्टिमाइजेशन में भी हो रहा है
Disadvantages
• AI इंफ्रास्ट्रक्चर से भारी कार्बन उत्सर्जन
• डेटा सेंटर कूलिंग के लिए अत्यधिक पानी की खपत
• कई देशों में डीज़ल जनरेटर पर निर्भरता
Source:
– Digiconomist
– The Guardian Environment Desk
Public Reaction + Expert Opinion
Ground report ke hisaab se…
पर्यावरण संगठनों और क्लाइमेट एक्टिविस्ट्स ने AI कंपनियों से अधिक पारदर्शिता की मांग की है।
Users ne react karte hue kaha…
सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने कहा कि AI सुविधाजनक है, लेकिन इसकी पर्यावरणीय कीमत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
Experts ka maanna hai…
डॉ. प्रिया शर्मा, क्लाइमेट पॉलिसी एनालिस्ट, कहती हैं कि
“AI विकास को रिन्यूएबल एनर्जी और एनर्जी-एफिशिएंट हार्डवेयर के साथ जोड़ना ज़रूरी है।”
Source:
– Climate Policy Interviews, Global Media Reports
India-Specific Impact
भारत में 2025 के दौरान डेटा सेंटर निवेश तेज़ी से बढ़ा है।
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में बिजली ग्रिड की अस्थिरता के कारण डेटा सेंटर डीज़ल बैकअप पर निर्भर रहते हैं।
इससे भारत में AI-संबंधित कार्बन उत्सर्जन और स्थानीय प्रदूषण दोनों बढ़ने की आशंका जताई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ग्रीन डेटा सेंटर पॉलिसी पर तेज़ी से काम करना होगा।
Source:
– Indian IT & Energy Sector Reports
– International Climate Coverage
Future Impact
IEA और अन्य आधिकारिक संस्थाओं के अनुसार,
AI और डेटा सेंटर की ऊर्जा मांग आने वाले वर्षों में लगातार बढ़ेगी।
सरकारें अब डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों में शामिल करने पर विचार कर रही हैं।
भविष्य में AI कंपनियों के लिए कार्बन रिपोर्टिंग और एनर्जी स्टैंडर्ड अनिवार्य हो सकते हैं।
Source:
– International Energy Agency
– Government Climate Policy Briefs
Conclusion
2025 में AI का पर्यावरणीय प्रभाव अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।
जब AI का कार्बन उत्सर्जन एक बड़े शहर के बराबर हो जाए, तो टिकाऊ तकनीक की जरूरत और भी बढ़ जाती है।
आने वाले समय में यह तय करेगा कि दुनिया AI को कैसे अपनाती है —
बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए, या भारी कीमत चुकाकर।
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